स्क्रीन की लत: किशोरियों में डिप्रेशन, लड़कों में आक्रामकता का खतरा

स्क्रीन की लत: किशोरियों में डिप्रेशन, लड़कों में आक्रामकता का खतरा

 

नई दिल्ली: आज के डिजिटल युग में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट जैसे उपकरण हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इनका अत्यधिक उपयोग किशोरों के लिए गंभीर खतरा बन रहा है। स्वीडन के प्रतिष्ठित कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन ने इस चिंताजनक स्थिति को उजागर किया है। “प्लॉस ग्लोबल पब्लिक हेल्थ” पत्रिका में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने से किशोरों में नींद की समस्या और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियाँ बढ़ रही हैं। खास तौर पर लड़कियों में अनिद्रा और डिप्रेशन का खतरा देखा गया, जबकि लड़कों में यह आक्रामकता और चिड़चिड़ेपन के रूप में सामने आया। यह अध्ययन न केवल माता-पिता और शिक्षकों के लिए एक चेतावनी है, बल्कि समाज के सामने एक गंभीर सवाल भी खड़ा करता है कि हम अपने बच्चों को डिजिटल दुनिया के इस जाल से कैसे बचाएँ।

शोध में 12 से 16 साल की उम्र के 4,810 छात्रों को शामिल किया गया, जिनके स्क्रीन टाइम, नींद की गुणवत्ता और मानसिक स्वास्थ्य पर एक साल तक नजर रखी गई। परिणाम चौंकाने वाले थे। जिन किशोरों ने स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताया, उनकी नींद में तीन महीने के भीतर ही खलल पड़ना शुरू हो गया। उनकी नींद का समय कम हुआ और गुणवत्ता में भी गिरावट आई। कई किशोर देर रात तक जागते रहे, जिसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा। शोधकर्ताओं ने पाया कि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी और लगातार मानसिक उत्तेजना नींद के चक्र को बिगाड़ने के प्रमुख कारण हैं। यह प्रभाव लड़के और लड़कियों पर अलग-अलग तरीके से दिखाई दिया, जो इस समस्या की जटिलता को और बढ़ाता है।

लड़कियों के मामले में स्क्रीन टाइम का असर डिप्रेशन से पहले नींद की समस्या के रूप में सामने आया। अध्ययन के अनुसार, 38 से 57 प्रतिशत लड़कियों में पहले नींद में खलल पड़ा और फिर यह डिप्रेशन में तब्दील हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि लड़कियाँ सोशल मीडिया और ऑनलाइन तुलना के दबाव में अधिक रहती हैं, जिससे उनकी नींद प्रभावित होती है और मानसिक तनाव बढ़ता है। दूसरी ओर, लड़कों में स्क्रीन टाइम का प्रभाव व्यवहार में बदलाव के रूप में देखा गया। नींद की कमी ने उन्हें चिड़चिड़ा, गुस्सैल और आक्रामक बना दिया। शोधकर्ताओं का कहना है कि लड़के अक्सर वीडियो गेम्स या एक्शन से भरपूर कंटेंट में ज्यादा समय बिताते हैं, जो उनकी भावनाओं को उत्तेजित करता है और नींद को प्रभावित करता है।

यह पहली बार नहीं है जब स्क्रीन टाइम और स्वास्थ्य के बीच संबंध सामने आया हो। पहले भी कई अध्ययनों में यह बात साबित हो चुकी है कि स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना चिंता, तनाव और नींद से जुड़ी समस्याओं को जन्म देता है। लेकिन यह नया शोध इस सवाल का जवाब ढूंढने में सफल रहा कि क्या नींद की कमी डिप्रेशन को जन्म देती है या डिप्रेशन नींद को प्रभावित करता है। नतीजे बताते हैं कि स्क्रीन टाइम पहले नींद को बिगाड़ता है, जो बाद में मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। खासकर किशोरावस्था में, जब मस्तिष्क और शरीर तेजी से विकसित हो रहे होते हैं, यह प्रभाव और भी गंभीर हो जाता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि स्क्रीन टाइम का असर नींद की कई परतों पर पड़ता है। यह न केवल सोने के समय को टालता है, बल्कि गहरी नींद (REM स्लीप) को भी प्रभावित करता है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी होती है। इसके अलावा, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन के उत्पादन को रोकती है, जो नींद को नियंत्रित करता है। नतीजतन, किशोरों का सर्कैडियन रिदम (शारीरिक घड़ी) बिगड़ जाता है, जिससे उनकी दिनचर्या और स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर पड़ता है।

इस समस्या से निपटने के लिए स्वीडन की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ने सितंबर 2024 में सलाह जारी की थी कि किशोरों को अपनी नींद और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए फुर्सत के समय में रोजाना 2 से 3 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम से बचना चाहिए। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर इन दिशा-निर्देशों का पालन किया जाए, तो किशोरों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके लिए माता-पिता को भी जागरूक रहने की जरूरत है। उन्हें बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए और सोने से पहले डिवाइस के इस्तेमाल को सीमित करना चाहिए।

यह अध्ययन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि डिजिटल सुविधाओं का लाभ लेते हुए हमें अपनी सेहत को कितना जोखिम में डालना चाहिए। किशोरों के लिए यह संतुलन बनाना और भी जरूरी है, क्योंकि यह उनके भविष्य को प्रभावित कर सकता है। माता-पिता, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे। स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने वाली तकनीकों का उपयोग और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना इस समस्या का समाधान हो सकता है।

अंत में, यह शोध एक चेतावनी है कि तकनीक का अंधाधुंध इस्तेमाल हमें सुविधा तो दे सकता है, लेकिन यह हमारे बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी छीन सकता है। समय रहते इस पर ध्यान देना जरूरी है, वरना आने वाली पीढ़ी को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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