महिला सशक्तिकरण और दहेज प्रथा पर नाटक, वैश्विक युद्ध पर भाषण: हीरालाल रामनिवास महाविद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम का दूसरा दिन

महिला सशक्तिकरण और दहेज प्रथा पर नाटक, वैश्विक युद्ध पर भाषण: हीरालाल रामनिवास महाविद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम का दूसरा दिन

 

संतकबीरनगर। खलीलाबाद में स्थित हीरालाल रामनिवास स्नातकोत्तर महाविद्यालय में मंगलवार को वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दूसरे दिन विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘दहेज प्रथा’ जैसे विषयों पर नाटक प्रतियोगिता हुई, जबकि ‘वैश्विक युद्ध की चुनौतियाँ एवं परिणाम’ पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई।

सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में आयोजित नाटक प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और दहेज प्रथा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर नाट्य मंचन प्रस्तुत किए। डॉ. प्रदीप कुमार और डॉ. शौर्यजीत सिंह निर्णायक मंडल के सदस्य रहे और उन्होंने प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी ने किया, जबकि संयोजक श्री पुरुषोत्तम पांडेय ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। डॉ. राजेश गुप्ता और श्रीमती कंचनलता पांडेय ने आयोजन में सहयोग किया। कुमकुम वर्मा, विवेकमणि, अतुल, सिंपल, अंतिमा, आस्था और ममता जैसे प्रमुख प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुतियों से छात्रों को जागरूक किया।

इसी क्रम में ‘वैश्विक युद्ध की चुनौतियाँ एवं परिणाम’ विषय पर एक भाषण प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसमें 18 छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। इस प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में डॉ. मनोज कुमार वर्मा, श्रीमती दीप्शी सिंह और चंद्र प्रकाश शाही शामिल थे। कार्यक्रम प्रभारी डॉ. फखरे आलम और सह प्रभारी विजय बहादुर तथा सुश्री चांदनी भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ब्रजेश त्रिपाठी ने इस अवसर पर कहा कि सांस्कृतिक कार्यक्रम विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति क्षमता और नेतृत्व कौशल विकसित करते हैं। उन्होंने बताया कि मंच पर प्रस्तुति देने से झिझक दूर होती है और व्यक्तित्व निखरता है। ऐसे कार्यक्रम नृत्य, संगीत, नाटक, कविता और चित्रकला के माध्यम से विद्यार्थियों की सृजनात्मक प्रतिभा को मंच प्रदान करते हैं, जिससे उनकी कल्पनाशक्ति और नवाचार की क्षमता बढ़ती है। प्रो. त्रिपाठी ने यह भी कहा कि ये कार्यक्रम भारतीय संस्कृति, परंपराओं और लोक कलाओं को जीवित रखने में सहायक होते हैं, जिससे विद्यार्थी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझते और उससे जुड़ते हैं।

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