सावन की याद दिलाता हैं,झूलते गाते हुई सावनी कजली गीत।

सावन के बहाने याद आते हैं पुराने तराने

सावन की याद दिलाता हैं,झूलते गाते हुई सावनी कजली गीत।

पहले रात भर महिलाओ की कजरी की गूंज सुनाई देती थीं,अब रस्म अदायगी।

सावन से अनेकों त्योहारों का सिलसिला कजरी से शुरू होता हैं।

विष्णु दत्त शुक्ला /सहजनवा।कुछ ऐसे गीतों के साथ होती है सावन की शुरुआत। इस ऋतु के आते ही महिलाओं की जुबां पर ये गीत बरबस ही आ जाते हैं। इस मौसम के जादू से कोई अछूता नहीं रह पाता। सावन की यह बहार अपने संग ले आती है भावनाओं में सराबोर कुछ अनकही कहानियां.. काले-काले मेघ देखते ही मोर जहां अपने पंख फैलाकर खुशी जताता है। वहीं, तपती धरती पर बरसती बूंदें वातावरण में सोंधी खुशबू बिखेर देती हैं। सखियां झूला झूलते हुए कजरी का आनंद लेती हैं। तो, वहीं अरबी के पत्तों के पकौड़े, दाल भरी पूड़ी, खीर, अनरसा, घेवर जैसे स्वादिष्ट पकवानों का स्वाद इस मौसम का मजा दोगुना कर कर देता है। जी हां, कुछ ऐसी ही खासियत है ‘सावन’ ऋतु की। जिसके आते ही पशु-पक्षी ही नहीं प्रकृति भी खुशी से झूम उठती है। कजरी लोकगीत का जिक्र आते ही पूर्वी उत्तर प्रदेश की परंपराएं और रीति-रिवाज सजीव हो उठते हैं। छम-छम बरसती बूंदों के बीच झूलों पर ऊंची-ऊंची पींगें, सखियों का हास-परिहास, सास-ननद के ताने-उलाहने, पिया से रूठना-मनाना, सब कुछ शामिल होता है इन लोक गीतों में। पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला हरतालिका तीज व्रत यहीं से शुरू हुआ। हालांकि, ‘सावन’ तो आज भी वही है, पर इसे मनाने के तौर-तरीकों में आधुनिकता के रंग भी शामिल हो गए हैं। व्यस्त दिनचर्या के बावजूद भी नेवास महिलाएं इस परंपरा को जीवंत किए हैं। हर सावन में नेवास, इस परंपरा को इन महिलाओं और बच्चियों ने जीवित कर रखा है बता दें कि हर साल इसी तरह सावन को झूला झूल कर गीत गाकर इस परंपरा को निभा रही हैं और महिलाएं कहती है कि इस परंपरा को जीवन तक निभाना चाहिए यह खट्टी मीठी यादें के साथ यह त्यौहार जुड़ा हुआ है। इस दौरान संध्या ,सुनीता, राजिया, खुशबू आदि लोगों ने गीत गाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

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