खिचड़ी मेला: त्रेतायुग से चली आ रही बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की अनूठी परंपरा
गोरखपुर। मकर संक्रांति के साथ शुरू होने वाला गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला पूर्वांचल की सबसे बड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है। यह मेला न केवल श्रद्धा और आस्था का केंद्र है, बल्कि मनोरंजन, सामाजिक समरसता और रोजगार का भी संगम है। लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं और बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर पुण्य अर्जित करते हैं।
खिचड़ी चढ़ाने की यह परंपरा त्रेतायुग से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि आदि योगी गुरु गोरखनाथ एक बार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में मां ज्वाला देवी के दरबार पहुंचे। मां ने उनके लिए भव्य भोजन का प्रबंध किया, लेकिन बाबा ने कहा कि वे योगी हैं और भिक्षा में मिली चीजों को ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने मां से पानी गर्म करने का अनुरोध किया और स्वयं भिक्षाटन को निकल गए। भिक्षा मांगते हुए वे गोरखपुर पहुंचे और राप्ती-रोहिण के तट पर जंगलों में धूनी रमाकर साधना में लीन हो गए। उनका तेज देखकर लोग उनके खप्पर में चावल-दाल दान करने लगे। मकर संक्रांति के अवसर पर यह परंपरा खिचड़ी पर्व के रूप में स्थापित हो गई। कहा जाता है कि आज भी ज्वाला देवी के दरबार में बाबा की खिचड़ी के लिए पानी उबल रहा है।
15 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन ब्रह्म मुहूर्त में सबसे पहले गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित करते हैं। तत्पश्चात नेपाल राजपरिवार की ओर से खिचड़ी चढ़ाई जाती है। इसके बाद मंदिर के पट खुलते हैं और जनसामान्य अपनी आस्था खिचड़ी के रूप में निवेदित करने लगता है। चढ़ाई गई खिचड़ी वर्षभर जरूरतमंदों में वितरित की जाती है।
खिचड़ी मेला सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है। यहां हिंदू-मुस्लिम सबकी दुकानें हैं और जाति-पंथ की दीवारें धराशायी हो जाती हैं। नेपाल, बिहार, उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। मेला परिसर में सजावट, सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।
यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने, सकारात्मक ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक है। बाबा गोरखनाथ की इस अनूठी परंपरा ने सदियों से लाखों लोगों को आस्था और एकता का संदेश दिया है।















