स्क्रीन का जाल, बच्चों को ऑटिज्म का शिकार बना रहा है।
संतकबीरनगर: आज के डिजिटल युग में बच्चे मोबाइल और टीवी की स्क्रीन में उलझते जा रहे हैं, लेकिन यह सुविधा अब उनके लिए खतरा बन रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में ऑटिज्म डिसऑर्डर और स्पीच डिले का बड़ा कारण बन रहा है। ऑटिज्म के लक्षण जैसे आंखों का संपर्क न बनाना, बातों का जवाब न देना, अपनी दुनिया में खोए रहना और अर्थहीन बोलना या बोलने में देरी, छोटे बच्चों में तेजी से बढ़ रहे हैं। यह समस्या तब शुरू होती है, जब माता-पिता बच्चों को शांत करने के लिए मोबाइल थमा देते हैं।
डॉ. इशांत सिंह, बाल रोग विशेषज्ञ, बताते हैं कि लगातार मोबाइल या टीवी देखना एकतरफा संवाद (वन-वे कम्युनिकेशन) को बढ़ावा देता है, जो बच्चों के भाषा विकास को रोकता है। जब बच्चा परेशान करता है, तो माता-पिता उसे गैजेट्स दे देते हैं। धीरे-धीरे बच्चे का दिमाग यह समझने लगता है कि रोने या जिद करने से स्क्रीन मिलेगी। नतीजा? बच्चा असल दुनिया से कट जाता है और ऑटिज्म की गिरफ्त में आ जाता है। यह न सिर्फ उसकी सेहत, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक विकास को भी ठप कर देता है।
जागरूकता ही इस समस्या का पहला हल है। माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें और उनके साथ समय बिताएं। खेल, बातचीत और किताबें बच्चों के दिमाग को सक्रिय रखती हैं। अगर ऑटिज्म के लक्षण दिखें, तो तुरंत थेरेपी की मदद लें। डॉ. सिंह कहते हैं, “जितना जल्दी हस्तक्षेप करेंगे, बच्चा उतनी जल्दी अपनी दुनिया में लौट आएगा।” यह एक मूक महामारी है, जो हमारे घरों में पनप रही है। अपने बच्चों को गैजेट्स की लत से बचाएं, वरना उनकी खामोशी एक दिन बड़ी कीमत वसूल कर सकती है। समय है, संभल जाएं और अपने नन्हे सपनों को ऑटिज्म के अंधेरे से बाहर लाएं।















