नल नील की कहानी जैसा लेबर कैम्प, मंदिर बनाने वाले मजदूर कहते हैं, ये राम का काम है

आंखन देखी अयोध्या… चौथी कहानी

राममंदिर के लैबर कैम्प से…।

नल नील की कहानी जैसा लेबर कैम्प, मंदिर बनाने वाले मजदूर कहते हैं, ये राम का काम है

ये देश के सबसे मजबूत हाथ हैं जो कुछ गढ़ते हैं और इनकी मजबूत छाती में दुबकी धड़कने, इन दिनों रामधुन बुदबुदाती हैं

अयोध्या।

जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥

राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥

जामवंत ने नल-नील दोनों भाइयों को बुलाकर उन्हें कहा मन में श्री राम को स्मरण कर सेतु तैयार करो, रामप्रताप से बिना परिश्रम के बन जाएगा।

 

जन्मभूमि का दस नंबर गेट। रामलला तक रामकोट के रास्ते जाने वाला रास्ता। पुलिस की 3 बैरिकेडिंग पार कर सड़क उस गेट तक पहुंचती जहां से रोज 4 से 6 हजार मजदूर पिछले कई सालों से राम मंदिर बनाने आते और जाते हैं। मैटल डिटेक्टर वाले गेट से गुजरते हैं। आधार कार्ड और पास दिखाते हैं। ये मजदूर खास हैं। क्योंकि इनके हिस्से राममंदिर बनाने की जिम्मेदारी आई है।

 

समय होगा लगभग 1 बजे दुपहरी का। सिर पर पीली प्लास्टिक वाली टोपी और नारंगी जाली वाली हाफ सदरी पहने कई जोड़ी कदम बिना हांफे 20 मिनट तक इस गेट से बाहर आए जा रहे हैं। मतलब गिनती करना चाहें तो गणित में कम से कम बीएससी करना होगा। ये वक्त खाने की छुट्टी का है। और मजदूरों की ये लाइन एक नीले कंटेनर वाले लेबर मोहल्ले में जाकर खत्म होती है। तीर्थ क्षेत्र भवन से होते हुए मैं भी इन पीली टोपी वालों के साथ हो ली। एक किमी बाद हम उसी लेबर मोहल्ले में थे। 

 

बाहर कुछ चार-छह ठेलों पर रोटियां-पूड़ियां बन रहीं थीं। दोने में बार-बार सब्जी परोसी जा रही थी। और कुछ कदम जल्दी-जल्दी कंटेनर वाले कमरों के भीतर जा रहे थे।

 

लखीमपुर से आए पृथ्वीपाल से बात होने लगी। आधी पूड़ी का एक कौर अपने मुंह में डालते हुए कहने लगे, काम तो वहां भी बहुत मिल रहा था लेकिन ये वाला रामनाम का काम है। इसके लिए न जाने कितने लोग मर गए। बक्सर के सुनील मिश्रा यहां से पहले हैदराबाद में थे। सुनील कहते हैं, कंपनी वहां वाले काम के ज्यादा पैसे देती थी, यहां काम करके खुशी होती है। 

 

बिहार यूपी के अलावा राजस्थान के सबसे ज्यादा मजदूर यहां हैं। पत्थर वाला काम सिर्फ राजस्थान के मजदूर कर रहे हैं। अलवर के मानसिंह चहकते हुए, लगभग कॉलर ऊंची करनेवाले मोड में कहते हैं, वो काशी में कॉरिडोर का पत्थरवाला दरवाजा भी मैंने ही बनाया था। उनके साथ राज्य के अलग-अलग जिलों से आए कई मजदूर यहां तीन शिफ्ट में ड्यूटी कर रहे हैं। अब तो नाइट शिफ्ट भी लगने लगी है। विनोद कहते हैं, इंजीनियर बहुत जल्दबाजी कर रहा है आजकल, मेरा तो दिमाग खराब हो रहा है। 

 

वैसे तो 8000 मजदूरों का रजिस्ट्रेशन राममंदिर के लिए हुआ था। कुछ पहले आए थे, फिर कुछ लौट गए। जो अभी हैं इन्हें भी 10-15 तारीख तक अपना काम पूरा करना है। फिर प्राणप्रतिष्ठा तक काम बंद रहेगा और ये अपने घर छुट्टी चले जाएंगे।

 

इनका सुपरवाइजर कहता है – गरीबी बुरी चीज है। 1600 किमी दूर से ये लोग इसलिए आएं हैं ताकि बीवी बच्चों के लिए रोटी जुगाड़ सकें। लेकिन इन्हें राममंदिर के काम में इतना आनंद आ रहा है कि ये वापस जाना ही नहीं चाहते। काम करते ये जब तक रामभजन गुनगुनाने लगते हैं। कौन सा वाला भजन, इस सवाल पर गुजरात के ब्रजेंद्र बहुत कोशिश करते हैं याद करने की। मुस्कुराते हैं, फिर कहते हैं वो है ना सिया राम वाला, वही भजन गाते हैं हम काम करते वक्त। 

 

किसी के गले में राम नाम लिखा पट्टा है तो किसी के गले में मफलर। पट्टा-मफलर दोनों ही अपनी आखिरी लिमिट तक धूल में सने हैं। हाथ में औजार हैं। पत्थर काटने वाली मशीन और शायद पिंचिस-पाने जैसा कुछ। खाना खाने के बाद कुछ देर सुस्ताने वो सड़क के किनारे बैठ गए हैं। गेट में एंट्री 2 बजे ही मिलेगी, न दस मिनट पहले न बाद। इलेक्ट्रिसिटी का काम करनेवाले दो लोग इसी गेट पर अस्थाई पास का इंतजार कर रहे हैं। आपस में बतिया रहे हैं। रोज तो पास लेना ही होगा, राममंदिर है ये, कोई डिब्बा में बम ले आए तो…। 

 

बचपन में नल और नील की कहानी सी दुनिया है इस लेबर कैम्प की। ये देश के सबसे मजबूत हाथ हैं जो कुछ गढ़ते हैं। और इनकी मजबूत छाती में दुबकी धड़कने, इन दिनों रामधुन बुदबुदाती हैं। मजदूर नहीं इन्हें आप रामभक्त की टोली कह सकते हैं।

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