ज्ञान, वैराग्य, धर्म, ऐश्वर्य, यश और श्री जिसमें नित्य निवास करते हैं वही भगवान कहलाते हैं – आचार्य ज्ञान चंद्र द्विवेदी
– भिटहा स्थित “चतुर्वेदी विला” में चल रही नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रोता
– मुख्य यजमान चंद्रावती देवी के नेतृत्व में डा उदय प्रताप चतुर्वेदी, राकेश चतुर्वेदी, राजन चतुर्वेदी और रजत ने उतारी कथा व्यास की आरती
संतकबीरनगर।
श्रीमद्भागवत में केवल भगवान ही प्रतिपाद्य हैं, भग छः होते हैं ज्ञान, वैराग्य,धर्म,ऐश्वर्य,यश और श्री ।यह जिसमें नित्य निवास करते हैं उसको ही भगवान कहते हैं । उन्हीं भगवान का प्रतिपादक होने के कारण इस पुराण का नाम भागवत है। उक्त उद्गार बुधवार को भिटहा स्थित “चतुर्वेदी विला” में चल रही नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के छठवें दिन भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन सुनाते हुए कथा व्यास आचार्य ज्ञान चंद्र द्विवेदी ने व्यक्त किया। कथा को आगे बढ़ाते हुए आचार्य द्विवेदी ने कहा कि काल से अपवित्र भूमि, स्नान से शरीर, प्रक्षालन से वस्त्र, संस्कार से गर्भ, तपस्या से इंद्रियां यज्ञ से ब्राह्मण, दान से धन, संतोष से मन और आत्मज्ञान से आत्मा की शुद्धि होती है। कथा को गति देते हुए आचार्य द्विवेदी ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण अपनी लीला के दौरान द्वापर में सबसे पहले पूतना का उद्धार करते हैं तो वहीं भगवान श्रीराम ने भी सतयुग में सबसे पहले ताड़का का उद्धार किया था। भगवान श्रीकृष्ण ने आंख बंद करके पूतना का वध किया क्योंकि वह योगी हैं और
भगवान श्रीराम ने आंख खोलकर ताड़का का उद्धार किया क्योंकि वह मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। आचार्य द्विवेदी ने बाल लीलाओं की श्रृंखला को आगे सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने जिन असुरों का बाल लीलाओं के दौरान वध किया वे कहीं न कहीं सार्वजनिक बुराइयों के परिचायक रहे हैं। आध्यात्मिक रूप से पूतना अविद्या (माया) है। शकटासुर जड़वाद, वकासुर दंभ,अघासुर पाप धेनुकासुर देहाध्यास, कालियानाग भोगशक्तिरूप विष है। स्व पंडित सूर्य नारायण चतुर्वेदी की स्मृति में आयोजित कथा के दौरान गोमती चतुर्वेदी, जनार्दन चतुर्वेदी, सविता चतुर्वेदी, शिखा चतुर्वेदी, अंकित पाल, आलोक उपाध्याय, प्रमुख प्रतिनिधि मुमताज अहमद, धनंजय चतुर्वेदी, दिग्विजय यादव, आशीष चौरसिया, आनंद ओझा सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।















