विश्व नींद दिवस: खर्राटे सिर्फ शोर नहीं, जानलेवा बीमारी का संकेत

विश्व नींद दिवस: खर्राटे सिर्फ शोर नहीं, जानलेवा बीमारी का संकेत

 

गोरखपुर। शुक्रवार को विश्व भर में विश्व नींद दिवस (World Sleep Day) मनाया जा रहा है। यह अंतरराष्ट्रीय जागरूकता अभियान नींद और नींद संबंधी विकारों के बारे में जानकारी देने और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों के प्रति लोगों को सचेत करने का प्रयास है। इस साल मुख्य फोकस ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) पर है, जो खर्राटों से जुड़ी सबसे आम और खतरनाक समस्या है।

वैश्विक आंकड़े चिंताजनक हैं: 30–69 वर्ष के लगभग 93.6 करोड़ वयस्क OSA से प्रभावित हैं, जिनमें 42.5 करोड़ लोगों में मध्यम से गंभीर OSA पाया जाता है। वैश्विक स्तर पर वयस्कों में इसकी दर 9% से 38% तक है, जबकि स्लीप स्टडी के आधार पर औसत 22–23% है।

भारत में स्थिति और गंभीर है। एम्स दिल्ली के अध्ययन के अनुसार करीब 10.4 करोड़ लोग स्लीप एपनिया से पीड़ित हैं। भारतीय वयस्कों में OSA की दर लगभग 11% है—पुरुषों में 13% और महिलाओं में 5% तक। शहरी क्षेत्रों में गंभीर OSA की दर 19.5% तक पहुंच चुकी है, जबकि मध्यम से गंभीर OSA के लगभग 4.7 करोड़ मामले हैं, जिन्हें तत्काल इलाज की जरूरत है।

खर्राटे अक्सर गले के ऊतकों के ढीले पड़ने से वायुमार्ग संकुचित होने पर उत्पन्न होते हैं। स्लीप एपनिया में नींद के दौरान सांस रुकने से हृदय पर दबाव पड़ता है, जिससे उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक, हृदय रोग, दिन में अत्यधिक थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी हो सकती है। प्रमुख लक्षणों में तेज खर्राटे, नींद में हांफना, सुबह सिरदर्द, मुंह सूखना और दिनभर थकान शामिल हैं।

जोखिम कारक: मोटापा, 40+ उम्र, पुरुष होना, शराब-धूम्रपान, संकरा वायुमार्ग या बढ़े टॉन्सिल।

निदान के लिए स्लीप स्टडी (पॉलिसोमनोग्राफी) सबसे प्रभावी है। उपचार में सीपीएपी मशीन सबसे कारगर है, जो नींद में वायुमार्ग खुला रखती है। अन्य विकल्प: ओरल अप्लायंसेस, वजन कम करना, करवट लेकर सोना, शराब से परहेज और गंभीर मामलों में सर्जरी।

विश्व नींद दिवस का संदेश स्पष्ट है: हर व्यक्ति को अच्छी सेहत के लिए रोजाना कम से कम 7 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद जरूरी है। खर्राटों को हल्के में न लें। यदि नींद प्रभावित हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें। भारत में 90% से अधिक मामले अनदेखे रह जाते हैं क्योंकि लोग इसे सामान्य समझते हैं। समय रहते जागरूकता और इलाज से जानलेवा जोखिमों से बचा जा सकता है।

(डॉ. एस.के. लाट)

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