नेवास गांव में हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ धूमधाम से मनाया गया मुहर्रम, गोरखपुर में मातमी जुलूसों का उमड़ा सैलाब।
गोरखपुर । गीडा थाना क्षेत्र के नेवास गांव में मुहर्रम का त्योहार हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल बनकर उभरा। गांव के बंटू शाही, मोनू सिंह, धर्मेंद्र सिंह, अमर सिंह बर्फानी, सोनू शर्मा, सोनू सिंह, धीरेंद्र सिंह, कमालू, आफताब, हरि शंकर, सुरेश सिंह मोहम्मद आजाद, नौशाद, जैसे लोग इस पर्व को एकजुट होकर धूमधाम से मनाने में जुटे। गीडा पुलिस की मुस्तैदी ने इस आयोजन को और व्यवस्थित बनाया, जिससे हिंदू-मुस्लिम तहजीब का बेहतरीन समन्वय देखने को मिला। गोरखपुर में मातमी जुलूसों से गूंजा शहर।
गोरखपुर। मुहर्रम की दसवीं तारीख को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में शहर मातमी जुलूसों से गूंज उठा। सुबह की पहली किरण के साथ इमाम चौकों से ताजिया और अलम के साथ अकीदतमंदों का कारवां कर्बला की ओर बढ़ा। ‘या हुसैन’, ‘या अली’ के नारे सड़कों पर गूंजते रहे। कर्बला पहुंचकर ताजियों को सुपुर्द-ए-खाक किया गया और दुआओं के साथ शहादत को सलाम किया गया। शहर के मस्जिदों, इमाम चौकों और घरों में कुरआन ख्वानी, फातिहा और विशेष दुआओं का आयोजन हुआ। अकीदतमंदों ने मीठा चावल, बिरयानी और शर्बत बांटकर भाईचारे का संदेश दिया। रहमतनगर की सुन्नी बहादुरिया जामा मस्जिद में गौसे आजम फाउंडेशन ने सामूहिक रोजा इफ्तार का आयोजन किया, जिसमें समीर अली, मौलाना अली अहमद, मोहम्मद फैज समेत सैकड़ों लोग शामिल हुए। तुर्कमानपुर के मकतब-ए-इस्लामियात में महिलाओं ने महफिल सजाकर इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया। वक्ताओं ने कर्बला की शहादत को इंसानियत और सत्य की राह में सबसे बड़ा बलिदान बताते हुए युवाओं को प्रेरणा लेने का आह्वान किया। जुलूसों ने बांधा समां बक्शीपुर, नखास चौक, अलीनगर, जाफरा बाजार और ईदगाह रोड से गुजरते जुलूसों में अलम, रोशन चौकियां, सजे-धजे घोड़े और ऊंट आकर्षण का केंद्र बने। फूलों की वर्षा और शर्बत वितरण से जुलूसों का स्वागत हुआ। कई स्थानों पर बेहतरीन ताजियों और अखाड़ों को पुरस्कृत किया गया। मियां बाजार के मेले में देर रात तक रौनक रही, जहां बच्चे-बुजुर्ग सभी उत्साह से शामिल हुए। पुलिस-प्रशासन की रही मुस्तैदी सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस और प्रशासन पूरे दिन सक्रिय रहे। रात होते-होते ताजिया जुलूस कर्बला की मिट्टी में विलीन हो गए, और मातमी कार्यक्रमों का समापन हुआ। यह मुहर्रम नेवास से गोरखपुर तक एकता, भाईचारे और शहादत की याद का प्रतीक बना।















