लोगों के ख्वाहिशों और सपनों का बाजार है बरदहिया।

लोगों के ख्वाहिशों और सपनों का बाजार है बरदहिया।

 

-हफ्ते में शनिवार से शुरु होकर इतवार की रात को आबाद होता है बाजार।

-बहुतेरे कारोबारी रेडीमेड कपड़ें लुधियाना या कानपुर से लाते है और साड़ियां सूरत से 

-पतलून-कमीज, साड़ी -दुपट्टे बैग,बेल्ट,दरी,चादर,लुंगी, टोपी ,अंगोछा,अंडरगारमेंट की बिक्री होती हैं 

-पशु बाजार की वजह से नाम मिला बरदहिया 

उत्तर प्रदेश। संतकबीरनगर…..

खलीलाबाद शहर का बरदहिया बाजार रेडीमेड कपड़ों और जरूरत के दूसरे सामान के व्यापार का ठिकाना बन गया है। रात के कपड़ा बाजार के तौर पर इसकी ख्याति दूरदराज के कारोबारियों के साथ आस-पास के इलाके में भी है। हफ्ते में दो दिन शनिवार दोपहर से शुरू होकर इतवार की रात को आबाद होने वाला बरदहिया बाजार ऐसे बेशुमार लोगों की ख्वाहिशों का बाजार भी है, जिनके लिए बड़ी दुकानों में दाखिल होना सिर्फ सपना है। 

आम तौर पर अंधेरे और सन्नाटे में डूबे रहने वाला यह इलाका सप्ताह में दो दिन शनिवार और रविवार को खूब गुलजार रहता है। पतलून-कमीज और साड़ी-दुपट्टे के साथ बैग, बेल्ट, दरी, चादर, लुंगी, अंगोछा, अंडरगारमेंट और भी जाने क्या-क्या‌। बाजार में प्रवेश होते ही दोनों ओर कपड़ों के अंबार और बल्ब की रोशनी में बिखरे तमाम रंग ध्यान खींचते है। एकदम नई स्टाइल के कपड़े किसी नई फिल्म की हीरो-हीरोइन के कपड़ों की झलक देते या फिर किसी मशहूर ब्रांड के कपड़ों की नकल में मिल जाती हैं। गोरखपुर से यहां आकर दुकान लगाने वाले रवि कुमार ने कमीज दिखाते हुए बताया कि कई बार वे अपना डिजाइन देकर इन्हें बाहर से बनवाते हैं। रवि बताते है कि ये कपड़े दरअसल उन लोगों की जरूरत हैं, जो ब्रांडेड कपड़े खरीदने की स्थिति में नहीं होते हैं। हूबहू नकल वाली शर्ट या टीशर्ट यहां ढाई सौ-तीन सौ रुपये में मिल जाती है। 

यहां बहुतेरे कारोबारी रेडीमेड कपड़े लुधियाना या फिर कानपुर से लाते हैं और साड़ियां सूरत से। मोटा कपड़ा बेचने वालों के फड़ बाजार में पीछे की ओर मिलते हैं। बदले वक्त में वे भी हमारी जरूरतों में पीछे छूट गए हैं। मगहर, मुखलिसपुर, महुली, अमरडोभा आदि कस्बों में होजरी का कारोबार करने वाले कई लोग अपनी दुकानें यहां सजाएं दिखे। असदुल्लाह बताते है कि लुंगी, गमछा, चादर टांडा से खरीद कर लाते हैं और यहां बेचते हैं। बाजार की जमीन के स्वामित्व वाले परिवार के शादाब यह मानते है कि यहां जो रौनक जाड़े के दिनों में होती है, वह अन्य दिनों में नहीं रहती है। यहां पुराने कपड़े की बिक्री का ठिकाना भी है।

—————————————-

हमारी दुकान में बच्चों और युवाओं के कपड़ों से भरी है। ज्यादातार शर्ट, टीशर्ट बेचते हैं। कुछ स्टाइल के आधार बनवाते हैं कुछ बाहर से मंगवाते हैं।

मुबारक 

व्यवसायी

———————————-

मैं अपनी दुकान में लेडीज शूट का थोक कारोबार करता हूं। इनमें कुछ अपनी सुविधा के अनुसार नई स्टाइल के बनवाता हूं। कुछ माल बाहर से मंगवाकर बिक्री जाती है। 

राहुल कुमार

 बस्ती  

——————————————-

 पशु बाजार की वजह से नाम मिला बरदहिया

 

बरदहिया बाजार शुरु करने का श्रेय धौरहरा के मरहूम मिर्जा अब्दुल कासिम को है। सन् 1925 में उन्होंने यहां पशु बाजार की शुरुआत कराई। उनके नाम से ही इसे पहचान मिली- कासिम बाजार मवेशियान। बाद में बोलने की सहूलियत के चलते लोगों ने इसे बरदहिया कहना शुरू कर दिया। मंगलवार को बाजार लगता और बुधवार दोपहर तक सिमट जाता। तब दूर-दूर से पशुओं के व्यापारी यहां जुटते थे। उनके बेटे मिर्जा इल्तिजा हुसैन की कोशिश से यहां कपड़ों का बाजार भी लगने लगा। सुल्तानपुर की मनियारपुर रियासत में उनकी ननिहाल की रानी इलाही बेगम ने कभी अलीगंज में ऐसा ही बाजार शुरू किया था और यही उनकी प्रेरणा बन गया। 

—————————————

कपड़ा बाजार 1934 में शुरू हुआ। तब यह साप्ताहिक बाजार सोमवार को सुबह लगती और दोपहर तक खत्म हो जाती थी। मगहर के साई बाबा आढ़तियां थे, जो आस-पास के इलाके के बुनकरों के बनाए कपड़े खरीद लाते थे। वे, सेठ मजीद और अमरडोभा के मोहम्मद हसन बुनकरों को अपने कपड़ों की बिक्री के लिए यहां आने को प्रोत्साहित करते थे। उन दिनों बिहार और बंगाल के व्यापारी भी कपड़े खरीदने के लिए यहां जुटते थे। लाइसेंस खत्म हो जाने की वजह से 1999 के बाद पशु बाजार तो लगना बंद हो गया, मगर इसका बरदहिया का नाम अभी तक बरकरार है। लंबे अर्से से यहां कपड़े के कारोबार का तो खूब विस्तार हुआ है, अलबत्ता अब बुनकरों के काम की बहुत तवज्जो नहीं रह गई।    

मिर्जा मोहम्मद सिब्तैन

Previous articleगोरखपुर महोत्सव को लेकर हुई बैठक। 
Next articleईंट भट्ठे पर मजदूर की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here