सावन की याद दिलाता हैं,झूलते गाते हुई सावनी कजली गीत।

सावन की याद दिलाता हैं,झूलते गाते हुई सावनी कजली गीत।

पहले रात भर महिलाओ की कजरी की गूंज सुनाई देती थीं,अब रस्म अदायगी।

सावन से अनेकों त्योहारों का सिलसिला कजरी से शुरू होता हैं।

गोरखपुर ।पिपरौली।गुदगुदाती सावनी गीतों के साथ सावन की याद दिलाती हैं।
इस ऋतु के आते ही महिलाओं की जुबां पर सावनी गीतें बरबस ही आ जाती हैं।
बताया जाता हैं कि सावन मास का मदमस्त महिने का जादू से कोई अछूता नहीं रह पाता। सावन की यह बहार अपने संग ले आती है।और सावनी भावनाओं में सराबोर कुछ अनकही कहानियां.. काले-काले मेघ देखते ही मोर जहां अपने पंख फैलाकर खुशी जताता है। वहीं, तपती धरती पर बरसती बूंदें वातावरण में खुशबू बिखेर देती हैं। सखियां झूला झूलते हुए कजरी का आनंद लेती हैं। तो, वहीं अरूई के पत्ते की पकौड़े, दाल भरी पूड़ी, खीर, अनरसा, घेवर जैसे स्वादिष्ट पकवानों का स्वाद इस मौसम का मजा और दोगुना कर कर देता है।
ऐसी ही खासियत है ‘सावन’ ऋतु की जिसके आते ही पशु-पक्षी ही नहीं प्रकृति भी खुशी से झूम उठती है। कजरी लोकगीत का जिक्र आते ही पूर्वी उत्तर प्रदेश की परंपराएं और रीति-रिवाज सजिदा हो उठते हैं। छम-छम बरसती बूंदों के बीच झूलों पर ऊंची-ऊंची पेगें, सखियों का हास-परिहास, सास-ननद के ताने-उलाहने, पिया से रूठना-मनाना, सब कुछ सावनी गीतों मे शामिल होता है।
इन लोक गीतों में पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला हरतालिका तीज व्रत यहीं से शुरू हुआ। हालांकि, ‘सावन’ तो आज भी वही है, पर इसे मनाने के तौर-तरीकों में आधुनिकता के रंग भी शामिल हो गए हैं। व्यस्त दिनचर्या के बावजूद भी नेवास महिलाएं इस परंपरा को जीवंत किए हैं। हर सावन में नेवास, इस परंपरा को इन महिलाओं और बच्चियों ने जीवित कर रखा है बता दें कि हर साल इसी तरह सावन को झूला झूल कर गीत गाकर इस परंपरा को निभा रही हैं और महिलाएं कहती है कि इस परंपरा को जीवन तक निभाना चाहिए यह खट्टी मीठी यादें के साथ यह त्यौहार जुड़ा हुआ है। इस दौरान संध्या ,सुनीता, राजिया, खुशबू आदि लोगों ने गीत गाकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

क्या कहती है गांव की महिलाएं—–
कंचन सिंह ने बताया कि पहले जैसा अब नहीं समय मिलता हैं।साथ ही पहले बाग हुआ करता था।उस बाग मे घर के गारजियन झूला एक माह पहले ही पड़ जाता था।दिन मे छोटे तथा रात मे महिलाएं झूला का आनंद लेती थी।

2–जया सिंह ने बताया पहले संयुक्त परिवार रहता था।अब पति-पत्नी बच्चे सिमित परिवार मे घरेलू कार्य मे ही दिन बीत जाता हैं।किसी का रूचि भी नहीं रह गया हैं।नहीं पहले जैसी ब्यवस्था रह गयीं हैं।मानो अब केवल रस्म ही बनकर रह गया हैं।

रामानुज आचार्य पिपरौली बताते हैं कि सावन मास का नाग पंचमी आपसी सौहार्द, मधुर मिलन तथा मन -बचन-कर्म को आन्तरिक आन्नदित करने वाला पर्व हैं।सनातन धर्म मे सावन से त्योहारो का सिलसिला शुरू होकर होली तक रहता हैं।जो सभी प्रकार से हमें समाज मे अच्छे से जीने की सीख देता हैं।

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